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Sanskrit translation of class 8 chapter 12 कः रक्षति कः रक्षितः in hindi

 कः रक्षति कः रक्षितः (कौन रक्षा करता है किसकी रक्षा की जाये।)

पाठ का परिचय
[प्रस्तुत पाठ स्वच्छता तथा पर्यावरण सुधार को ध्यान में रखकर सरल संस्कृत में लिखा गया एक संवादात्मक पाठ है। हम अपने आस-पास के वातावरण को किस प्रकार स्वच्छ रखें कि नदियों को प्रदूषित न करें, वृक्षों को न काटें, अपितु अधिकाधिक वृक्षारोपण करें और धरा को शस्यश्यामला बनाएँ। प्लास्टिक का प्रयोग कम करके पर्यावरण संरक्षण में योगदान करें। इन सभी बिन्दुओं पर इस पाठ में चर्चा की गई है। पाठ का प्रारंभ कुछ मित्रों की बातचीत से होता है, जो सांयकाल में दिनभर की गर्मी से व्याकुल होकर घर से बाहर निकले हैं -]



(क) (ग्रीष्मौ सायंकाले विद्युदभावे प्रचण्डोष्मणा पीडितः वैभवः गृहात् निष्क्रामति)
वैभवः – अरे परमिन्दर्! अपि त्वमपि विद्युदभावेन पीडितः बहिरागतः?
परमिन्दर् – आम् मित्र! एकतः प्रचण्डातपकालः अन्यतश्च विद्युदभावः परं बहिरागत्यापि पश्यामि यत् वायुवेगः तु सर्वथाऽवरुद्धः।

सत्यमेवोक्तम् प्राणिति पवनेन जगत् सकलं, सृष्टिर्निखिला चैतन्यमयी।
क्षणमपि न जीव्यतेऽनेन विना, सर्वातिशायिमूल्यः पवनः॥

विनयः – अरे मित्र! शरीरात् न केवलं स्वेदबिन्दवः अपितु स्वेदधाराः इव प्रस्रवन्ति स्मृतिपथमायाति शुक्लमहोदयैः रचितः श्लोकः। तप्तर्वाताघातैरवितुं लोकान् नभसि मेघाः,
आरक्षिविभागजना इव समये नैव दृश्यन्ते॥

सरलार्थ-
गर्मी के मौसम में शाम के समय बिजली के चले जाने पर बहुत तेज गर्मी से परेशान वैभव घर से बाहर निकलता है।)

वैभव – अरे परमिंदर ! क्या तुम भी बिजली के चले जाने से परेशान होकर बाहर आ गए हो। 

परमिंदर – हाँ मित्र ! एक तो बहुत तेज गर्मी का समय है दूसरा बिजली चली गई है, परन्तु बाहर आने के बाद देखता हूँ कि  हवा की गति भी पूरी तरह से रुक गई है। 

सत्य ही कहा है –
वायु से ही  प्राणवान है अर्थात जीवित है, पूरी सृष्टि वायु के कारण ही सजीव है।

इसके बिना अर्थात वायु के बिना क्षण भर के लिए भी जीवित नहीं रहा जा सकता है। सबसे अधिक मूल्यवान हवा ही है। 

विनय – अरे मित्र ! शरीर से न केवल पसीने की बूंदें बल्कि पसीने की नदियाँ है। शुक्ल महोदय के द्वारा रचित श्लोक याद आ रहा है। 

तपती हुई हवा के आघात से लोगों को बचाने के लिए आकाश में बादल भी सुरक्षा विभाग के लोगों की तरह दिखाई नहीं दे रहे है। अर्थात जिस प्रकार जरुरत समय सुरक्षा  लोग दिखाई नहीं देते वैसे ही गर्मी  समय आकाश  नहीं दिखाई देते हैं।  

शब्दार्थ-
प्रचण्ड-भयंकर।
बहिः-बाहर।
आगतः-आ गया।
प्रचण्ड-तीव्र।
अन्यतः-और भी।
आगत्य-आकर।
अवरुद्धः-रुक गया।
प्राणिति-जीवित है (Survives)।
सकलम्-सारा।
निखिला-सम्पूर्णं (Whole)।
जीव्यते-जीवित है।
सर्वातिशायि-सबसे बढकर।
स्वेदबिन्दवः-पसीने की बूंदें।
प्रस्रवन्ति-बह रही हैं।
तप्तैः-गर्म।
वाताघातैः-लू के द्वारा।
अवितुम्-रक्षा करने के लिए।
नभसि-आकाश में। आरक्षिः-पुलिस।
दृश्यन्ते-दिखाई पड़ते हैं।




(ख) परमिन्दर् – आम् अद्य तु वस्तुतः एव
निदाघतापतप्तस्य, याति तालु हि शुष्कताम्।
पुंसो भयादितस्येव, स्वेदवज्जायते वपुः॥

जोसेफः – मित्राणि! यत्र-तत्र बहुभूमिकभवनानां, भूमिगतमार्गाणाम्, विशेषतः
मैट्रोमार्गाणां, उपरिगमिसेतूनाम् मार्गेत्यादीनां निर्माणाय वृक्षाः कर्त्यन्ते
तर्हि अन्यत् किमपेक्ष्यते अस्माभिः? वयं तु विस्मृतवन्तः एव

एकेन शुष्कवृक्षण दह्यमानेन वह्निना।
दह्यते तद्वनं सर्वं कुपुत्रेण कुलं यथा॥

सरलार्थ –
परमिंदर – आज तो वास्तव में (अर्थात वास्तव में ही आकाश में बादल दिखाई नहीं दे रहे)
तेज गर्मी के ताप से मनुष्य तालु सुख जाता है। भयभीत मनुष्य का शरीर पसीने से तरबतर हो जाता है।  
जोसेफ – मित्र ! यहाँ – वहाँ पृथ्वी पर भवनों का, भूमिगत मार्गों का, विशेष रूप से ऊपर से मैट्रो के मार्गों के पुलों इत्यादि के निर्माण के अत्यधिक वृक्ष काटे जाते हैं। अवश्य ही हमसे क्या अपेक्षा की जाती है?  हम तो भूल ही गए –
एक सूखे हुए वृक्ष के द्वारा पूरा वन जला दिया जाता है उसी प्रकार कुपुत्र के द्वारा पूरा कुल का ही नाश हो जाता है। 

शब्दार्थ-
वस्तुतः-वास्तव में।
निदाघ-गर्मी।
याति-प्राप्त होता है।
शुष्कताम्-सूखापन।
पुंसः-मनुष्य का।
भयादितस्य-भयभीत।
वपुः-शरीर।
स्वेदवत्-पसीने से तर।
उपरिगामि-ऊपर से जाने वाले।
कर्त्यन्ते-काटे जाते हैं।
शुष्क-सूखा।
विस्मृतवन्तः- भूल गए हैं।
वह्निना-अग्नि के द्वारा।
दह्यमानेन-जलाए जाते हुए।
शक्ष्येम-सकेंगे।
आगच्छन्तु-आओ।




(ग) परमिन्दर् – आम् एतदपि सर्वथा सत्यम्! आगच्छन्तु नदीतीरं गच्छामः। तत्र चेत्
काञ्चित् शान्तिं प्राप्तुं शक्ष्येम।
(नदीतीरं गन्तुकामाः बालाः यत्र-तत्र अवकरभाण्डारं दृष्ट्वा वार्तालापं कुर्वन्ति)

जोसेफः – पश्यन्तु मित्राणि यत्र-तत्र प्लास्टिकस्यूतानि अन्यत् चावकरं प्रक्षिप्तमस्ति।
कथ्यते यत् स्वच्छता स्वास्थ्यकरी परं वयं तु शिक्षिताः अपि अशिक्षिता
इवाचरामः अनेन प्रकारेण…. वैभवः – गृहाणि तु अस्माभिः नित्यं स्वच्छानि क्रियन्ते परं किमर्थं स्वपर्यावरणस्य
स्वच्छतां प्रति ध्यानं न दीयते। विनयः पश्य-पश्य उपरितः इदानीमपि अवकरः मार्गे क्षिप्यते।
(आहूय) महोदये! कृपां कुरू मार्गे भ्रमद्भ्यः । एतत् तु सर्वथा अशोभनं कृत्यम्।
अस्मत्सदृशेभ्यः बालेभ्यः भवतीसदृशैः एवं संस्कारा देयाः ।

रोजलिन् – आम् पुत्र! सर्वथा सत्यं वदसि! क्षम्यताम्। इदानीमेवागच्छामि। (रोजलिन् आगत्य बालैः साकं स्वक्षिप्तमवकर मार्गे विकीर्णमन्यदवकर चापि सङ्गृह्य अवकरकण्डोले पातयति)

सरलार्थ –
परमिंदर – हाँ ये बिलकुल सही है। चलो नदी के किनारे चलते हैं। वहाँ कुछ शांति प्राप्त  सकेंगे। 
(नदी किनारे जाने के इच्छुक बालक यहाँ – वहाँ गंदगी के ढेर देखकर बातचीत करते हैं।)
जोसेफ – मित्र देखो यहाँ – वहाँ  प्लास्टिक का थैला/थैलियाँ और अन्य दूसरा कचरा भी फेंका हुआ है। कहा जाता है कि स्वच्छता स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होती है। परन्तु हम शिक्षित होते हुए भी अनपढ़ों की तरह आचरण करते हैं इस प्रकार …….
वैभव – हम घरों को तो प्रतिदिन साफ़ करते हैं किन्तु किसलिए अपने पर्यावरण की स्वच्छता की और ध्यान नहीं दिया जाता है। 
विनय – देखो – देखो ऊपर से अभी भी मार्ग में कूड़ा-करकट डाला जा रहा है। 
(बुलाकर के) महोदय, कृपा करें मार्ग में ऐसे कूड़े को मत फैलाओ, ये तो हमेशा ही अशोभनीय कार्य है। अर्थात  रास्ते में कूड़ा – करकट फैंकना सही बात नहीं है। हमारे जैसे बालकों को आप जैसी महिलाएँ द्वारा इस प्रकार संस्कार दिए जायेंगे। अर्थात बड़ी महिलाओं  द्वारा छोटे बच्चों  प्रकार के संस्कार नहीं जाने चाहिए। 
रोजलिन – हाँ पुत्र ! बिल्कुल सही कह रहे हो। माफ़ कर दीजिये। अभी आती हूँ। 
(रोजलिन आ कर बालकों के साथ अपने द्वारा फेंका गया कचरे को एक साथ इकठ्ठा करके कूड़ेदान में डालती है। 

शब्दार्थ- अवकर-कूड़ा।
प्रक्षिप्तम्-फेंक दिया।
आचरामः-आचरण करते हैं।
दीयते-दिया जाता है।
उपरितः-ऊपर से।
भ्रमद्भ्यः -भ्रमण करते हुए। क
कत्यम्-कार्य।
क्षम्यताम्-क्षमा करिए।
अवगच्छामि-जानती हूँ।
कण्डोले-टोकरी में।



(घ) बालाः – एवमेव जागरूकतया एव प्रधानमन्त्रिमहोदयानां स्वच्छताऽभियानमपि गतिं प्राप्स्यति।
विनयः – पश्य पश्य तत्र धेनुः शाकफलानामावरणैः सह प्लास्टिकस्यूतमपि
खादति। यथाकथञ्चित् निवारणीया एषा। (मार्गे कदलीफलविक्रेतारं दृष्ट्वा बालाः कदलीफलानि क्रीत्वा धेनुमाह्वयन्ति भोजयन्ति च, मार्गात् प्लास्टिकस्यूतानि चापसार्य पिहिते अवकरकण्डोले क्षिपन्ति)

परमिन्दर् – प्लास्टिकस्य मृत्तिकायां लयाभवात् अस्माकं पर्यावरणस्य कृते महती क्षतिः भवति। पूर्वं तु कार्पासेन, चर्मणा, लौहेन, लाक्षया, मृत्तिकया, काष्ठेन वा निर्मितानि वस्तूनि एव प्राप्यन्ते स्म। अधुना तत्स्थाने प्लास्टिकनिर्मितानि वस्तूनि एव प्राप्यन्ते।

सरलार्थ-
बालक – इस प्रकार जागरूकता से ही प्रधानमंत्री महोदय का स्वच्छता अभियान भी गति प्राप्त करेगा। 
हम सभी के सहयोग से स्वच्छता अभियान सफल हो पायेगा। 
विनय – देखो देखो वहाँ जो गाय है सब्जियों और फलों के छिलकों के साथ प्लास्टिक की थैलियाँ भी खा रही हैं। इसको किसी भी तरह रोकना चाहिए। 
(मार्ग में केले बेचने वाले को देखकर बच्चे केले खरीद कर गाय को बुलाते है और खिलते है। रास्ते से प्लास्टिक की थैलियों को हटाकर ढके हुए कूड़ेदान में डालते है।)
परमिंदर – प्लास्टिक जो मिटटी में नष्ट नहीं होने के कारण हमारे पर्यावरण की बहुत अधिक हानि होती है। पहले तो कपास से, चमड़े से, लोहे से, लाख से, मिटटी से तथा काठ से बानी हुई ही वस्तुएँ प्राप्त होती थी।  अब उसके स्थान पर प्लास्टिक निर्मित वस्तुएँ ही प्राप्त होती हैं। 

शब्दार्थ-
प्राप्स्यति-प्राप्त करेगा।
आवरणैः-छिलकों।
यथाकथञ्चित्-जैसे-तैसे।
निवारणीया-हटाना चाहिए।
कदली-केला।
अपसार्य-हटाकर।
पिहित-ढके हुए।



(ङ) वैभवः – आम् घटिपट्टिका, अन्यानि बहुविधानि पात्राणि, कलमेत्यादीनि सर्वाणि नु प्लास्टिकनिर्मितानि भवन्ति।
जोसैफः – आम् अस्माभिः पित्रोः शिक्षकाणां सहयोगेन प्लास्टिकस्य विविधपक्षाः विचारणीयाः। पर्यावरणेन सह पशवः अपि रक्षणीयाः। (एवमेवालपन्तः सर्वे नदीतीरं प्राप्ताः, नदीजले निमज्जिताः भवन्ति गायन्ति च
सुपर्यावरणेनास्ति जगतः सुस्थितिः सखे।
जगति जायमानानां सम्भवः सम्भवो भुवि॥5॥
सर्वे – अतीवानन्दप्रदोऽयं जलविहारः।

सरलार्थ-
हाँ घड़ी का पट्टा और अन्य प्रकार के बर्तन, पेन/कलम आदि सब कुछ ही तो प्लास्टिक से बना हुआ होता है। 
जोसेफ – हाँ हमारे माता – पिता एवं गुरुजनों के सहयोग से प्लास्टिक के अनेक पहलुओं पर विचार करना चाहिए। पर्यावरण के साथ पशुओं की भी रक्षा करनी चाहिए। 
(इस प्रकार बातचीत करते हुए सभी नदी के किनारे पहुँच गए और नदी के जल में स्नान किया तथा गाते हैं – 
स्वच्छ पर्यावरण के द्वारा ही जगत की सुंदर  स्थिति है। संसार में उत्पन्न होने वालों की उत्पति पृथ्वी पर ही है। सभी अत्यधिक आनंद के साथ जल विहार करते हैं। 

शब्दार्थ-
मृत्तिकायां-मिट्टी में।
क्षतिः-हानि। कार्पासेन-कपास से।
चर्मणा-चमड़े से। लाक्षया-लाख से।
काष्ठेन-काठ से। आलपन्तः-बात करते हुए।
निमज्जिताः-स्नान किया।



Sanskrit translation of chapter 13 विमानयानं रचयाम् in hindi class 6

विमानयानं रचयाम्



(क)
राघव! माधव! सीते! ललिते!
विमानयानं रचयाम ।
नीले गगने विपुले विमले
वायुविहारं करवाम ||1||

सरलार्थ :
हे राघव, माधव, सीता, ललिता! आओ हम सब एक विमान बनाएं। नीले, स्वच्छ और विशाल आकाश में वायुविहार करें अर्थात आकाश में यात्रा करें।


शब्दार्थाः (Word Meanings) :
ललिते!-हे ललिता (oh Lalita), 
विमानयानम्-हवाई जहाज़ को (aeroplane), 
रचयाम-बनाएँ (should make), 
गगने-आकाश में (in sky), 
विपुले-बहुत अधिक (विस्तृत) (expansive), 
विमले-स्वच्छ (में) (clear), 
वायुविहारम्-वायु में भ्रमण (flying in the sky), 
करवाम-करें (should do)




(ख)
उन्नतवृक्षं  तुङ्गं भवन
क्रान्त्वाकाशं खलु याम ।
कृत्वा  हिमवन्तं सोंपानं
चन्दिरलोकं प्रविशाम ||2||

सरलार्थ :
ऊँचे पेड़ को, ऊँचे भवन को पार करके आकाश में चलें। बर्फ को हिमालय को सीढ़ी बनाकर चन्द्रलोक में प्रवेश करें। 


शब्दार्थाः (Word Meanings) :
उन्नतवृक्षम्-ऊँचे वृक्ष को (high tree), 
तुङ्गभवनम्-ऊँचे भवन को (high buildings), 
क्रान्त्वा -पार करके (crossing over), 
खलु-निश्चय से (surely), 
याम-जाएँ (should go), 
कृत्वा-करके (do), 
हिमवन्तम्-बर्फ को (की) (snow made), 
सोपानम्-सीढ़ी को (ladder), 
चन्दिरलोकम्-चन्द्रलोक में (को) (moonland), 
प्रविशाम-प्रवेश करें (should enter)




(ग)
शुक्रश्चन्द्र: सूर्यो गुरुरिति
ग्रहान्‌ हि सर्वान्‌ गणयाम ।।
विविधा: सुन्दरताराश्चित्वा
मौक्तिकहारं रचयांम ||3||

सरलार्थ :
शुक्र, चन्द्र, सूर्य बृहस्पति आदि सभी ग्रहों की गणना करें। अनेक प्रकार के सुन्दर तारों को चुनकर मोतियों का हार बनाएं। 


शब्दार्थाः (Word Meanings):
गुरु:-गुरु (बृहस्पति) (Jupiter), 
इति-इत्यादि (आदि) (et cetera), 
ग्रहान्-ग्रहों को (planets), 
गणयाम-गिर्ने (should count), 
विविधाः-अनेक (many), 
सुन्दरतारा:-सुन्दर तारों को (lovely stars), 
चित्वा-चुनकर (by picking up), 
मौक्तिकहारम्-मोतियों के हार को (pearl neckless), 
रचयाम-बनाएँ (should make)





(घ)
अम्बुदमालाम्‌ अम्बरभूषाम्‌
आदायैव हि प्रतियाम ।
दु:खित-पीडित-कृषिकजनानां
गृहेषु हर्ष जनयाम ||4||

सरलार्थ :
बादलों की माला को, आकाश की शोभा को लेकर ही लौटें। दुखी और पीड़ित किसानों के घरों में हम खुशियाँ उत्पन्न करें। अर्थात उनके घरों में खुशियाँ लाएं। 


शब्दार्थाः (Word Meanings):
अम्बुदमालाम्-बादलों की पंक्तियों को (cloud-garland)
अम्बरभूषाम्-आकाश की शोभा को (beauty of sky), 
आदाय-लेकर (taking), हि-निश्चय से (surely), 
प्रतियाम-वापस लौटें (should return), 
दुःखित-दुखी (दुख से युक्त) (sad), 
पीड़ित-पीड़ा से युक्त (victim), 
कृषिकजनानाम्-किसानों के (farmers), 
गृहेषु-घरों में (in houses), 
हर्षम्-प्रसन्नता को (in happiness), 
जनयाम-उत्पन्न करें (should create)

Sanskrit translation of chapter 9 क्रीडास्पर्धा in hindi class 6

क्रीडास्पर्धा


(क)
हुमा - यूयं कुत्र गच्छथ?
इन्दर: - वयं विद्यालयं गच्छाम:।
फेकन: - तत्र क्रीडास्पर्धा: सन्ति। वयं खेलिष्याम:।
रामचरण: - किं स्पर्धा: केवलं बालकेभ्य: एवं सन्ति?
प्रसन्‍ना - नहि, बालिका: अपि खेलिष्यन्ति।
रामचरण: - कि यूयं सर्वे एकस्मिन्‌ दले स्थ? अथवा पृथक्‌-पृथक्‌ दले?
प्रसन्‍ना - तत्र बालिका: बालका: च मिलित्वा खेलिष्यन्ति।
फेकन: - आम्‌, बेडमिंटन-क्रीडायां मम सहभागिनी जूली अस्ति।

सरलार्थ : 
हमा - तुम लोग कहाँ जा रहे हो ?

इंदर - हम विद्यालय जा रहे हैं। 

फेकन - वहाँ खेल प्रतियोगिताएँ हो रही हैं। हम भी खेलेंगे। 

रामचरण - क्या प्रतियोगिताएँ केवल लड़कों के लिए हैं ?

प्रसन्ना - नहीं लड़कियाँ भी खेलेंगी। 

रामचरण -क्या तुम सब एक दल में हो या पृथक-पृथक दल में ?

प्रसन्ना -वहाँ लड़के-लड़कियाँ मिलकर खेलेंगे। 

फेकन - हाँ, बैडमिंटन में मेरी साथी जुली है। 


शब्द (Word)अर्थ (Meanings)
यूयम्तुम सब (you all)
कुत्रकहाँ (where)
गच्छथजा रहे हो (are going)
वयम्हम सब (all of us)
विद्यालम्स्कूल (को) (to school)
गच्छामःजा रहे हैं (are going)
तत्रवहाँ (there)
क्रीडास्पर्धा:खेल-प्रतियोगिता (sports competition)
खेलिष्यामःखेलेंगी/खेलेंगे (shall play)
बालकेभ्य:लड़कों के लिए (for boys)
एवही (only)
बालिका:लड़कियाँ (girls)
अपिभी (also)
खेलिष्यन्तिखेलेंगी (shall play)
सर्वेसब (all)
एकस्मिन् दलेएक ही दल में (in one team)
स्थहो (are)
पृथक्अलग (different)
मिलित्वामिलकर (together)
आम्हाँ (yes)
बैडमिंटन क्रीडायाम्बैडमिंटन के खेल में (in the game of badminton)
मममेरा/ मेरे/मेरी (mine)
सहभागिनीसाथी (mate/partner)




(ख)
प्रसन्‍ना - एतद्‌ अतिरिक्‍तं कबड्डी, नियुद्धं, क्रिकेट, पादकन्दुकं , हस्तकन्दुकं , चतुरङ्ग: इत्यादय: स्पर्धा: भविष्यन्ति।
इन्दर: - हमे! कि त्वं न क्रीडसि? तव भगिनी तु मम पक्षे क्रीडति।
हुमा - नहि, मह्यं चलचित्रं रोचते। परम्‌ अतन्र अहं दर्शकरूपेण स्थास्यामि।
फेकन: - अहो! पूरन: कुत्र अस्ति? कि स: कस्यामपि स्पर्धायां प्रतिभागी नास्ति?

सरलार्थ : 
प्रसन्ना - इसके अतिरिक्त कबड्डी, जुडो, क्रिकेट, फुटबॉल, वाँलीबॉल, चैस इत्यादि स्पर्धाएँ भी होंगी। 

इन्दर -हुमा, क्या तुम नहीं खेल रही हो ? तुम्हारी बहन तो मेरी टीम में खेल रही है। 

हुमा - नहीं मुझे सिनेमा में रूचि है। वहाँ मैं दर्शक के रूप मैं रहूँगी। 

फेकन - ओह! पूरन कहाँ है ? क्या वह किसी मैच में भाग नहीं ले रहा ?


शब्दार्थाः (Word Meanings) :
एतत् अतिरिक्तं-इसके अलावा (beside this), 
नियुधं-जूडो (judo), 
पावकंदुकं-फुटबॉल (football), 
हस्तकन्दुकं-वॉलीबॉल/बास्केटबॉल (basket ball/ volleyball), 
चतुरङ्ग-चेस (chess), 
इत्यादयः-इत्यादि (etc.), 
भविष्यन्ति-होंगे/होंगी (will be), 
त्वम्-तुम (you), 
क्रीडसि-खेल रही हो (are playing) (singular), 
तव-तुम्हारी (your), 
भगिनी-बहन (sister), 
मम पक्षे-मेरे पक्ष में (in my team), 
मह्यम्-मुझे (मेरे लिए) ( for me), 
रोचते-अच्छा लगता है (like), 
स्थास्यामि-रहूँगी/रहँगा (shall stay), 
कस्यामपि (कस्याम् + अपि)-किसी में भी (in any), 
स्पर्धायाम्-प्रतियोगिता में (in a match), 
नास्ति (न + अस्ति )-नहीं है (is not)



(ग)
रामचरण: - स: द्र॒ष्टु न शक्‍नोति। तस्मेै अस्माकं विद्यालये पठनाय तु विशेषव्यवस्था वर्तते। परं क्रीडाये प्रबन्ध: नास्ति।
हुमा - अयं कथमपि न न्यायसङ्गत:। पूरन: सक्षम:, पर प्रबन्धस्य अभावात्‌ क्रीडितुं न शक्‍नोति।
इन्दरः - अस्मार्क तादृशानि अनेकानि मित्राणि सन्ति। वस्तुतः तानि अन्यथासमर्थानि।
फेकन: - अत: वयं सर्वे प्राचार्य मिलाम:। तं कथयाम:। शीघ्रमेव तेषां कृते व्यवस्था भविष्यति।

सरलार्थ : 
रामचरण - वह देख नहीं सकता।  उसके लिए हमारे विद्यालय में पढ़ने के लिए तो विशेष प्रबंध है, किन्तु खेल के  लिए प्रबंध नहीं है। 

हुमा - यह किसी प्रकार भी न्यायसंगत नहीं है।  पूरन सक्षम है, किन्तु प्रबंध के अभाव के कारण खेल नहीं सकता। 

इन्दर - हमारे ऐसे अनेक मित्र हैं। वास्तव में वे भिन्न तरीके से समर्थ हैं। 

फेकन - इसलिए हम सब प्रिंसिपल से मिलते हैं। उनसे कहते हैं।  अर्थात इस बारे में बात करते हैं। शीघ्र ही उनके लिए व्यवस्था हो जाएगी।

शब्दार्थाः (Word Meanings) :
द्रष्टुम्-देखना (to see), 
शक्नोति-सकता/सकती है (is able), 
तस्मै-उसके लिए (for him), 
अस्माकम्-हमारा/हमारी/हमारे (our), 
विद्यालये-विद्यालय में (in school), 
पठनाय-पढ़ने के लिए (for study), 
वर्तते-है (is), 
परम्-लेकिन (but), 
क्रीडायै-खेलने के लिए (for playing), 
अयम्-यह (this), 
कथमपि-किसी प्रकार भी नहीं (in no way), 
न्यायसङ्गत-उचित (justified), 
समर्थ-सक्षम, योग्य (capable), 
प्रबन्धस्य-प्रबन्ध के (for arrangement), 
अभावात्-अभाव के कारण (due to lack of), 
क्रीडितुम्-खेलने के लिए (to play), 
तादृशानि-वैसे (like that), 
वस्तुतः-वास्तव में (in fact), 
अन्यथासमर्थानि-अन्य तरीके से समर्थ (differently abled), 
मिलामः-मिलते हैं (हम) (meet), 
कथयामः-कहते हैं (tell), 
शीघ्रमेव (शीघ्रम् + एव)-जल्द ही (soon), 
तेषां कृते-उनके लिए (for them), 
व्यवस्था-व्यवस्था/इंतज़ाम (arrangement), 
भविष्यति-हो जाएगा/जाएगी (will be)





Sanskrit translation of chapter 1 शब्दपरिचयः 1 in hindi class 6

शब्दपरिचयः I


(क) एष: कः?
एष: चषक:।
किम्‌ एष: बृहत्‌?
न, एषः लघुः।
सरलार्थ-
यह कौन (कौन , पुंल्लिङ्ग के लिए) है ?
यह गिलास है ।
क्या यह बड़ा है ?
नहीं , यह छोटा है ।

WordMeaning
एषःयह
कःकौन / क्या
चषकःगिलास
किम्क्या / कौन
बृहत्बड़ा
नही
लघुःछोटा


(ख) सः क:?
स: सौचिक :।
सौचिक : कि करोति?
किं स: खेलति?
न, सः वस्त्रं सीव्यति।
सरलार्थ-
वह कौन है ?
वह दर्जी है ।
दर्जी क्या करता है ?
क्या वह खेलता है ?
नहीं , वह कपड़ा सिलता है ।

WordMeaning
सःवह
कःकौन।(पुंल्लिङ्ग के लिए )
सौचिकःदर्जी (कपड़ा सीने वाला)
किंंक्या /कौन
करोतिकरता है।
खेलतिखेलता है।
वस्त्रकपड़ा
सीव्यतिसिलाई करता है।


(ग) एतौ कौ?
एतौ शुनकौ स्त:।
किम्‌ एतौ गर्जत:?
न , एतौ उच्चै: बुक्कत:।
सरलार्थ-
ये (दो) कौन हैं ?
ये (दो) कुत्ते हैं ।
क्या ये (दोनों) गरजते हैं ।
नहीं , ये (दोनों) जोर से भौकते हैं ।

WordMeaning
एतौये (दो)
कौकौन (दो के लिए)
शुनकौ(दो) कुत्ते।
स्तःहै (दो के लिए)
किम्क्या।
गर्जतःगरजते है।
नही।
उच्चैःजोर से।
बुक्कतःभौकते है।

(घ) तौ कौ ?
तौ बलीवर्दौ स्तः।
किंं तौ धावत:?
न, तौ क्षेत्रं कर्षत:।
सरलार्थ-
वें (दो) कौन हैं ?
वे (दोनों) बैल हैं ।
क्या वे दौड़ रहे (दौड़ते) है ।
नहीं , वे (दोनों) खेत जोत रहे (जोतते) हैं ।

WordMeaning
तौवे दो(सः का प्रथमा विभक्ति, द्विवचन)
कौकौन(द्विवचन)
बलीवर्दो(दो) बैल
स्तःहै(दो के लिए)
किक्या
धावतःदौड़ते हैं
क्षेत्रंखेत।
कर्षतःजोतते है(द्विवचन मे)


(ङ) एते के?
एते स्यूता: सन्ति।
किम्‌ एते हरितवर्णा:?
नहि, एते नीलवर्णा: सन्ति।
सरलार्थ-
ये क्या है ?
ये थैले हैं ।
क्या ये हरे रंग के हैं ।
नहीं , ये नीले रंग के हैं ।

WordMeaning
एतेये,यह(एषः का बहुवचन)
केकौन(बहुवचन)
स्यूताःथैले(बहुवचन)
सन्तिहै(अस्ति का बहुवचन)
किम्क्या
हरितवर्णाःहरे रंग के
नहिनही
नीलवर्णाःनीले रंग के

(च) ते के?
ते वृद्धा: सन्ति।
किं ते गायन्ति?
नहि ते हसन्ति।
सरलार्थ-
वे सब कौन हैं ?
वे सब बूढे लोग हैं।
क्या वे गा रहे हैं ?
नहीं, वे सब हँस रहे हैं।

WordMeaning
तेवे सब।
केकौन।
वृद्धाःबूढ़े लोग।
सन्तिहै।
किंक्या।
गायन्तिगाते हैं।
नहिनहीं।
हसन्तिहंसते हैं।



Sanskrit translation of chapter 8 त्रिवर्णः ध्वजः in hindi of class 7

त्रिवर्णः ध्वजः


(क) (केचन बालका: काश्चन बालिकाश्च स्वतन्त्रता-दिवसस्य ध्वजारोहणसमारोहे सोत्साहं गच्छन्त:
परस्पर सलपन्ति।)

देवेश: - अद्य स्वतन्त्रता-दिवस:। अस्मार्क विद्यालयस्य प्राचार्य: ध्वजारोहणं करिष्यति। छात्राश्च सांस्कृतिककार्यक्रमान्‌ प्रस्तोष्यन्ति। अन्ते च मोदकानि मिलिष्यन्ति।
डेविड: - शुचे। जानासि त्वम्‌? अस्मार्कं ध्वज: कीदृश:?
शुचि: - अस्माकं देशस्य ध्वज: त्रिवर्ण: इति।

सरलार्थ - (कुछ बालक और कुछ बालिकाएँ स्वतंत्रता दिवस के ध्वजारोहन समारोह में उत्सह के साथ जाते हुए एक - दुसरे के साथ वार्तालाप करते हैं)
देवेश: - आज स्वतंत्रता दिवस है । हमारे विधालय के प्राचार्य ध्वजारोहण करते हैं छात्र सांस्कृितक कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे । और अन्त में लड्डू मिलेंगे ।
डेविड: - शुचि !( क्या ) तुम जानती हो ? हमारा झण्डा कैसा है ?
शुचि: - हमारे देश का झण्डा तिरंगा है ।


(ख) सलीम: - रुचे। अयं त्रिवर्ण: कथम्‌?
रुचि: - अस्मिन्‌ ध्वजे त्रयः वर्णा: सन्ति, अतः त्रिवर्णः। किं त्वम्‌ एतेषां वर्णानां नामानि जानासि?
सलीम: - अरे। केशरवर्ण:, श्वेत:, हरित: च एते त्रय: वर्णा:।
देवेश: - अस्माकं ध्वजे एते त्रयः वर्णा: कि सूचयन्ति?
सलीम: - शृणु, केशरवर्ण: शौर्यस्य, श्वेत: सत्यस्य, हरितश्च समृद्धे: सूचका: सन्ति।
शुचि: - किम्‌ एतेषां वर्णानाम्‌ अन्यदपि महत्त्वम्‌?
डेविड: - आम्‌ ! कथं न? ध्वजस्य उपरि स्थित: केशरवर्ण: त्यागस्य उत्साहस्य च सूचक:। मध्ये स्थित: श्वेतवर्ण: सात्तिवकताया: शुचिताया: च द्योतक:। अध: स्थित: हरितवर्ण: वसुन्धराया: सुषमाया: उर्वरतायाश्व द्योतक:।

सरलार्थ - सलीम: - रुचि ! यह तिरंगा कैसे है ?
रुचि - इस झण्डे में तीन रंग हैं । इसलिए तिरंगा है । क्या तुम अन तीनों रंगो के नाम जानते हो ?
सलीम: - अरे , केसरिया , सफेद और हरा - ये तीन रंग हैं ।
देवेश: - हमारे झण्डे में ये तीन रंग क्या सूचित करते हैं ।
सलीम: - सुनो , केसरिया रंग शौर्य का , श्वेत (सफेद) रंग त्याग और हरा रंग समृद्धि के सूचक हैं ।
शुचि: - क्या इन रंगो का अन्य महत्व भी है ?
डेविड: - हाँ क्यो नहीं ? झण्डे के उपर स्थित केसरिया रंग त्याग और उत्साह का सूचक है । बीच में स्थित केसरिया रंग सात्विकता और इमानदारी का सूचक है । नीचे स्थित हरा रंग प्रथ्वी की सौन्दर्य तथा उर्वरता का सूचक है ।


(ग) तेजिन्दरः - शुचे! ध्वजस्य मध्ये एकं नीलवर्णं चक्रं वर्तते?
शुचि: - आम्‌ आम्‌। इदम्‌ अशोकचक्रं कथ्यते। एतत्‌ प्रगते: न्यायस्य च प्रवर्तकम्‌। सारनाथे अशोकस्तम्भ: अस्ति। तस्मात्‌ एवं एतत्‌ गृहीतम्‌।
प्रणव: - अस्मिन्‌ चक्रे चतुर्विशति: अरा: सन्ति।
मेरी - भारतस्य संविधानसभायां 22 जुलाई 1947 तमे वर्ष समग्रतया अस्य ध्वजस्य स्वीकरणं जातम्‌?
तेजिन्दरः - अस्माकं त्रिवर्ण: ध्वज: स्वाधीनतया: राष्ट्रगौरवस्य च प्रतीक:। अत एव स्वतन्त्रादिवसे गणतन्त्रदिवसे च अस्य ध्वजस्य उत्तोलनं समारोहपूर्वकं भवति।
जयतु त्रिवर्ण: ध्वज:, जयतु भारतम्‌।

सरलार्थ - 
तेजिन्दरः - शुचि ! झण्डे के बीच में एक नीले रंग का पहिया है ।
प्रणव: - इस चक्र में चौबीस तीलियाँ (spokes) हैं ।
मेरी - भारत के संविधान सभा में 22 जुलाई 1947 को सम्पूर्ण रुप से इस झण्डे को स्वीकार किया गया ।
तेजिन्दरः - हमारा तिरंगा झण्डा स्वाधीनता और राष्ट्र गौरव का प्रतीक है । इसलिए ही स्वतंत्रता दिवश और गणतन्त्र दिवस पर इस झण्डे का उत्तोलनं समारोहपूर्वक होता है । तिरंगा झण्डे की जय हो । भारत की जय हो ।

Sanskrit translation of chapter 15 प्रहेलिका in hindi class 8

प्रहेलिका

पाठ का परिचय
पहेलियाँ मनोरंजन का एक प्राचीन विद्या (तरीका) है। ये लगभग संसार की सभी भाषाओं में उपलब्ध् हैं। संस्कृत के कवियों ने इस परम्परा को अत्यन्त समृद्ध किया है। पहेलियाँ हमें आनन्द देने के साथ-साथ हमारी मानसिक व बौद्धिक प्रक्रिया को तीव्र बनाती हैं। इस पाठ में संस्कृत प्रहेलिका (पहेली) बूझने की परम्परा के कुछ रोचक उदाहरण प्रस्तुत किए गए हैं।
(क) कस्तूरी जायते कस्मात्?
को हन्ति करिणां कुलम्?
किं कुर्यात् कातरो युद्धे?
मृगात् सिंहः पलायते।।1।।
अन्वयः कस्तूरी कस्मात् जायते? मृगात्। कः करिणां कुलम् हन्ति? सिंहः।
कातरः युद्धे किं कुर्यात्? पलायते।।

सरलार्थ: कस्तूरी किससे उत्पन्न होती है? मृग से। कौन हाथियों के समूह को मार देता है? सिंह। कमजोर व्यक्ति युद्ध में क्या करे? भाग जाए।

शब्दार्थ:
भावार्थ
जायते
उत्पन्न होता है।
हन्ति
मारता/मारती है।
करिणाम्
हाथियों का।
कुलम्
झुंड (समूह) को।
कुर्यात्
करे (करना चाहिए)।
कातरः
कमजोर।
पलायते
भाग जाता है (भाग जाना चाहिए)।

(ख) सीमन्तिनीषु का शान्ता?
राजा कोऽभूत् गुणोत्तमः?
विद्वद्भिः का सदा वन्द्या?
अत्रौवोक्तं न बुध्यते।।2।।

सरलार्थ: नारियों में कौन (सबसे अधिक) शान्त स्वभाव वाली है? सीता। कौन-सा राजा गुणों में उत्तम हुआ? राम। विद्वानों के द्वारा कौन हमेशा वन्दना करने योग्य है? विद्या। यहीं कही गई (यह बात) है (फिर भी मनुष्यों के द्वारा) नहीं जानी जा रही है अर्थात् पता नहीं चल रहा है।
अन्वय: का सीमन्तिनीषु शान्ता? सीता, गुणोत्तमः राजा अभूत्? रामः।
का सदा विद्वद्भिः वन्द्या? विद्या। अत्रा एव उक्तं (परम्) न बुध्यते।।
ध्यान दें: पंक्ति का प्रथम व अंतिम वर्णों के योग से बना शब्द ही उत्तर होगा।

शब्दार्थ:
भावार्थ:
सीमन्तिनीषु
नारियों में।
शान्ता
शान्त स्वभाव वाली।
कोऽभूत्
कौन हुआ।
गुणोत्तमः
गुणों में सबसे अच्छा।
विद्वद्भिः
विद्वानों के द्वारा।
वन्द्या
वन्दना के योग्य।
उक्तम्
कहा गया।
बुध्यते
जाना जाता है।

(ग) कं सञ्ज्घान कृष्णः?
का शीतलवाहिनी गङ्गा?
के दारपोषणरताः?
कं बलवन्तं न बाधते शीतम्।।3।।

अन्वय: कृष्णः कं सञ्ज्घान? कंसम्? शीतलवाहिनी गङ्गा का? काशी।
के दारपोषणरताः? केदारपोषणरताः। कं बलवन्तम् शीतम् न बाधते। कंबलवन्तम्।।
ध्यान दें: पहले दो या तीन वर्णों को मिलाने पर पहेली का उत्तर प्राप्त हो जाता है।
सरलार्थ: श्रीकृष्ण ने किसको मारा? कंस को। शीतल (ठण्डी) धरा वाली गंगा को बहाने वाली जगह कौन-सी है? काशी। पत्नी सहित बच्चों के पालन-पोषण में कौन लगे होते हैं? खेती के काम में संलग्न किसान। किस बलवान को ठण्ड कष्ट नहीं देती? कम्बल वाले व्यक्ति को।

शब्दार्थ:
भावार्थ:
कम्
किसे।
सञ्ज्घान
मारा।
कृष्णः
श्रीकृष्ण।
(कंसम् जघान कृष्णः) का
कौन।
शीतलवाहिनी
ठण्डी धरा वाली।
(काशी-तल-वाहिनी गङ्गा) के
कौन।
दारपोषणरताः
पत्नी के पोषण में लीन।
केदार-पोषण-रताः
खेती के काम में संलग्न।

(घ) वृक्षाग्रवासी न च पक्षिराजः
त्रिनेत्रधारी न च शूलपाणिः।
त्वग्वस्त्रधारी न च सिद्धयोगी
जलं च बिभ्रन्न घटो न मेघः।।4।।

अन्वयः वृक्षाग्रवासी च न पक्षिराजः, त्रिनेत्रधारी च न शूलपाणिः। त्वग्वस्त्रधारी च न सिद्धयोगी, जलं च विभ्रन् न घटः न मेघः (अस्ति)।।

सरलार्थ: वृक्ष के ऊपर रहने वाला है और फिर भी पक्षियों का राजा गरुड़ नहीं है। तीन आँखों वाला है तो भी हाथ में त्रिशूलधारी शिव नहीं है। छाल रूपी वस्त्र को धरण करने वाला है फिर भी तपस्वी साधक नहीं है और जल को (अन्दर) धरण करता है तो भी न घड़ा है और न ही बादल है। अर्थात्-नारियल है।

शब्दार्थ:
भावार्थ:
वृक्षाग्रवासी
पेड़ के उपर रहने वाला।
पक्षिराजः
पक्षियों का राजा (गरुड़)।
त्रिनेत्रधारी
तीन नेत्रों वाला (शिव)।
शूलपाणिः
जिनके हाथ में त्रिशूल है (शंकर)।
त्वग्
त्वचा, छाल।
वस्त्रधारी
कपड़ों वाला।
सिद्धयोगी
तपस्वी (ध्यानी)।
बिभ्रन्न (बिभ्रन् + न)
धरण करता हुआ।

(ङ ) भोजनान्ते च किं पेयम्?
जयन्तः कस्य वै सुतः?
कथं विष्णुपदं प्रोक्तम्?
तक्रं शक्रस्य दुर्लभम्।।

अन्वय: भोजनान्ते च पेयम् किं? तक्रम्। जयन्तः वै कस्य सुतः? शक्रस्य। विष्णुपदं कथं प्रोक्तम्? दुर्लभम्।।

सरलार्थ: और भोजन के अंत में क्या पीना चाहिए? छाछ। निश्चय (निश्चित रूप) से जयन्त किसका पुत्र है? इन्द्र का। भगवान विष्णु का स्थान स्वर्ग (मोक्ष) कैसा कहा गया है? दुर्लभ (कठिनाई से प्राप्त होने योग्य)।

शब्दार्थ:
भावार्थ:
भोजनान्ते
भोजन के अन्त में।
वै
निश्चित रूप से।
सुतः
पुत्र।
विष्णुपदम्
स्वर्ग, मोक्ष।
प्रोक्तम्
कहा गया है।
तक्रम्
छाछ, मट्ठा।
शक्रस्य
इन्द्र का।
दुर्लभम्
कठिनाई से प्राप्त।

प्रहेलिकानामुत्तरान्वेषणाय सङ्केता:
प्रथमा प्रहेलिका - अन्तिमे चरणे क्रमशः त्रायाणां प्रश्नानां त्रिभिः पदैः उत्तरं दत्तम्।
द्वितीया प्रहेलिका - प्रथम-द्वितीय-तृतीय-चरणेषु प्रथमस्य वर्णस्य अन्तिमवर्णेन संयोगात् उत्तरं प्राप्यते
तृतीया प्रहेलिका - पत्येकं चरणे प्रथमद्वितीययोः प्रथमत्रायाणां वा वर्णानां संयोगात् तस्मिन् चरणे प्रस्तुत्सय प्रश्नस्य उत्तरं प्राप्यते।
चतुर्थप्रहेलिकाः उत्तरम् - नारिकेलफलम्
पञ्चमप्रहेलिकाः उत्तरम् - प्रथम-प्रहेलिकावत्।

पहेलियों के उत्तर खोजने (पाने) के लिए संकेत

पहली पहेली - अंतिम चरण के तीनों पदों (शब्दों) में पहेली के तीनों प्रश्नों के उत्तर दिए हुए हैं।

दूसरी पहेली - पहले, दूसरे और तीसरे चरणों के प्रथम और अंतिम वर्ण के मेल से बने शब्द ही उत्तर हैं।

तीसरी पहेली - प्रत्येक चरण के प्रथम दो या प्रथम तीन वर्णों को मिलाने से उस पहेली का उत्तर मिल जाता है।

चौथी पहेली - अंतिम चरण के तीनों पद (शब्द) ही पहेली में दिए गए प्रश्नों के उत्तर हैं।



ChaptersLink
Chapter 1सूभाषितानि
Chapter 2बिलस्य वाणी न कदापि मे श्रुता
Chapter 3डिजीभारतम्
Chapter 4सदैव पुरतो निधेहि चरणम
Chapter 5कण्टकेनैव कण्टकम्‌(old)
Chapter 6 गृहं शून्यं सुतां विना
Chapter 7भारतजनताऽहम्
Chapter 8संसारसागरस्य नायकाः
Chapter 9सप्तभगिन्यः
Chapter 10नीतिनवनीतम्‌
Chapter 11सावित्री बाई फुले
Chapter 12कः रक्षति कः रक्षितः
Chapter 13क्षितौ राजते भारतस्वर्णभूमिः
Chapter 14आर्यभटः
Chapter 15प्रहेलिका

Sanskrit translation of chapter 14 आर्यभटः in hindi class 8

आर्यभटः

पाठ का परिचय
भारतवर्ष की अमूल्य निधि है ज्ञान-विज्ञान की सुदीर्घ परम्परा। इस परम्परा को सम्पोषित करने वाले प्रबुद्ध मनीषियों में अग्रगण्य थे-आर्यभट। दशमलव प(ति का प्रयोग सबसे पहले आर्यभट ने किया, जिसके कारण गणित को एक नई दिशा मिली। इन्हें एवं इनके प्रवर्तित सिद्धांतों को तत्कालीन रूढ़िवादियों का विरोध् झेलना पड़ा। वस्तुतः गणित को विज्ञान बनाने वाले तथा गणितीय गणना पद्धति के द्वारा आकाशीय पिण्डों की गति का प्रवर्तन करने वाले (आर्यभट) ये प्रथम आचार्य थे। आचार्य आर्यभट के इसी वैदुष्य का उद्घाटन प्रस्तुत पाठ में है।

(क) पूर्वदिशायाम् उदेति सूर्यः पश्चिमदिशायां च अस्तं गच्छति इति दृश्यते हि लोके। परं न अनेन अवबोध्यमस्ति यत्सूर्यो गतिशील इति। सूर्योऽचलः पृथिवी च चला या स्वकीये अक्षे घूर्णति इति साम्प्रतं सुस्थापितः सिद्धांत:। सिद्धांतोंऽयं प्राथम्येन येन प्रवर्तितः, स आसीत् महान् गणितज्ञः ज्योतिर्विच्च आर्यभटः। पृथिवी स्थिरा वर्तते इति परम्परया प्रचलिता रूढिः तेन प्रत्यादिष्टा। तेन उदाहृतं यद् गतिशीलायां नौकायाम् उपविष्टः मानवः नौकां स्थिरामनुभवति, अन्यान् च पदार्थान् गतिशीलान् अवगच्छति। एवमेव गतिशीलायां पृथिव्याम् अवस्थितः मानवः पृथिवीं स्थिरामनुभवति सूर्यादिग्रहान् च गतिशीलान् वेत्ति।

सरलार्थ: संसार में यह दिखाई देता है कि सूर्य पूर्व दिशा में उदय होता है और पश्चिम दिशा में अस्त होता है परन्तु इससे यह नहीं जाना जाता है कि सूर्य गतिशील है। सूर्य अचल है और पृथ्वी चलायमान है जो अपनी धुरी पर घूमती है यह इस समय भली-भाँति स्थापित सिद्धांत है। इस सिद्धांत को सर्वप्रथम जिसने प्रारम्भ किया, वह महान् गणित का ज्ञाता और ज्योतिषी आर्यभट था। पृथ्वी स्थिर है, परम्परा से चली आ रही इस प्रथा (धरणा) का उन्होंने खण्डन किया। उन्होंने उदाहरण दिया कि चलती हुई नाव में बैठा हुआ मनुष्य नाव को रुकी हुई अनुभव करता है और दूसरे पदार्थों (वस्तुओं) को गतिशील समझता है। इसी तरह ही गति युक्त पृथ्वी पर स्थित मनुष्य पृथ्वी को स्थिर अनुभव करता है और सूर्य आदि ग्रहों को गतिशील जानता है।

शब्दार्थ: भावार्थ:
उदेति उदय होता है।
अस्तं गच्छति अस्त हो जाता है।
लोके संसार में।
अवबोध्यम् समझने योग्य, जानने योग्य, जानना चाहिए।
अचलः स्थिर, गतिहीन।
चला अस्थिर, गतिशील।
स्वकीये अपने।
अक्षे धुरी पर।
घूर्णति घूमती है।
साम्प्रतम् इस समय।
सुस्थापितः भली-भाँति स्थापित।
प्राथम्येन सर्वप्रथम।
प्रवर्तितः प्रारम्भ किया गया।
ज्योतिर्विद् ज्योतिषी।
प्रचलिता चलने वाली।
रूढिः प्रचलित प्रथा, रिवाज।
प्रत्यादिष्टा खण्डन किया।
उदाहृतम् उदाहरण दिया।
उपविष्टः बैठा हुआ।
अवगच्छति समझता है।
वेत्ति जानता है।

(ख) 476 तमे ख्रिस्ताब्दे (षट्सप्तत्यधिक्चतुःशततमे वर्षे) आर्यभटः जन्म लब्ध-वानिति तेनैव विरचिते 'आर्यभटीयम्' इत्यस्मिन् ग्रन्थे उल्लिखितम्। ग्रन्थोऽयं तेन त्रायोविंशतितमे वयसि विरचितः। ऐतिहासिकस्त्रोतोभि: ज्ञायते यत् पाटलिपुत्रं निकषा आर्यभटस्य वेधशाला आसीत्। अनेन इदम् अनुमीयते यत् तस्य कर्मभूमिः पाटलिपुत्रमेव आसीत्।

सरलार्थ: सन् 476वें ईस्वीय वर्ष में (चार सौ छिहत्तरवें वर्ष में) आर्यभट ने जन्म लिया, यह उन्होंने अपने द्वारा ही लिखे 'आर्यभटीयम्' नामक इस ग्रन्थ में उल्लेख किया है। यह ग्रन्थ उन्होंने तेईसवें वर्ष की आयु में रचा था। ऐतिहासिक स्त्रोतों से जाना जाता है (पता चलता है) कि पाटलिपुत्र (पटना) के निकट आर्यभट की नक्षत्रों को जानने की प्रयोगशाला थी। इससे यह अनुमान किया जाता है कि उनका कार्य क्षेत्र पाटलिपुत्र (पटना) ही था।

शब्दार्थ: भावार्थ:
ख्रिस्ताब्दे ईस्वी में।
षट्सप्ततिः छिहत्तर।
लब्ध्वान् लिया।
विरचिते रचे हुए।
इत्यस्मिन् (इति+ अस्मिन्) इस (में)।
उल्लिखितम् उल्लेख किया है।
वयसि आयु में, अवस्था में।
विरचितः रचा है।
स्त्रोतोभि: स्त्रोतों से।
ज्ञायते जाना जाता है।
निकषा निकट।
वेधशाला ग्रह, नक्षत्रों को जानने की प्रयोगशाला।

(ग) आर्यभटस्य योगदानं गणितज्योतिषा सम्बंद्ध वर्तते यत्र संख्यानाम् आकलनं महत्त्वम् आदधाति। आर्यभटः फलितज्योतिषशास्त्रो न विश्वसिति स्म। गणितीयपद्धत्या कृतम् आकलनमाधृत्य एव तेन प्रतिपादितं यद् ग्रहणे राहुकेतुनामकौ दानवौ नास्ति कारणम्। तत्र तु सूर्यचन्द्रपृथिवी इति त्राीणि एव कारणानि। सूर्यं परितः भ्रमन्त्याः पृथिव्याः, चन्द्रस्य परिक्रमापथेन संयोगाद् ग्रहणं भवति। यदा पृथिव्याः छायापातेन चन्द्रस्य प्रकाशः अवरुध्यते तदा चन्द्रग्रहणं भवति। तथैव पृथ्वीसूर्ययोः मध्ये समागतस्य चन्द्रस्य छायापातेन सूर्यग्रहणं दृश्यते।

सरलार्थ: आर्यभट का योगदान (सहयोग) गणितज्योतिष से सम्बन्ध् रखता है जहाँ संख्याओं की गणना महत्त्व रखती है। आर्यभट फलित ज्योतिषशास्त्र में विश्वास नहीं करते थे। गणित शास्त्र की पद्धति (तरीके) से किए गए आकलन (गणना) पर आधरित करके ही उन्होंने कहा (प्रतिपादित किया) कि ग्रहण (लगने) में राहु और केतु नामक राक्षस कारण नहीं हैं। वहाँ पर सूर्य, चन्द्रमा और पृथ्वी ये तीनों ही कारण हैं। सूर्य के चारों ओर घूमती हुई पृथ्वी का चन्द्रमा के घूमने के मार्ग के संयोग (कारण) से ग्रहण होता है। जब पृथ्वी की छाया पड़ने से चन्द्रमा का प्रकाश रुक जाता है तब चन्द्र ग्रहण होता है। वैसे ही पृथ्वी और सूर्य के बीच में आए हुए चन्द्रमा की परछाई से सूर्य ग्रहण दिखाई पड़ता है (देता है)।

शब्दार्थ: भावार्थ:
योगदानम् सहयोग।
सम्बद्धम् सम्बन्ध्ति।
आकलनं गणना।
आदधति रखता है।
विश्वसिति स्म विश्वास करता था।
गणितीयपद्धत्या गणित की पद्धति (तरीके) से।
आकलनम् गणना।
आधृत्य आधरित करके।
प्रतिपादितम् वर्णन किया गया।
परितः चारों ओर।
भ्रमन्त्याः घूमने वाली की, घूमती हुई की।
परिक्रमापथेन घूमने के मार्ग से।

(घ) समाजे नूतनानां विचाराणा स्वीकारे प्रायः सामान्यजनाः काठिन्यमनुभवन्ति। भारतीयज्योतिःशास्त्रो तथैव आर्यभटस्यापि विरोध्ः अभवत्। तस्य सिद्धांता: उपेक्षिताः। स पण्डितम्मन्यानाम् उपहासपात्रं जातः। पुनरपि तस्य दृष्टिः कालातिगामिनी दृष्टा। आधुनिकै: वैज्ञानिकै: तस्मिन्, तस्य च सिद्धान्ते समादरः प्रकटितः। अस्मादेव कारणाद् अस्माकं प्रथमोपग्रहस्य नाम आर्यभट इति कृतम्।
वस्तुतः भारतीयायाः गणितपरम्परायाः अथ च विज्ञानपरम्परायाः असौ एकः शिखरपुरुषः आसीत्।

सरलार्थ:समाज में नए विचारों को स्वीकार करने (मानने) में अधिकतर सामान्य लोग कठिनाई को अनुभव करते हैं। भारतीय ज्योतिष शास्त्र में वैसे ही आर्यभट का विरोध् हुआ। उनके सिद्धांत अनसुने कर दिए गए (नहीं माने गए)। वह स्वयं को भारी विद्वान मानने वालों की हँसी का पात्र (विषय) बन गए। फिर भी उनकी दृष्टि (विचारधरा) समय को लाँघने वाली देखी गई (दिखाई पड़ी)। किन्तु आधुनिक वैज्ञानिकों ने उनमें, और उनके सिद्धांत में आदर (विश्वास) प्रकट किया। इसी कारण से हमारे पहले उपग्रह का नाम आर्यभट रखा गया।
वास्तव में भारत की गणित परम्परा के और विज्ञान की परम्परा के वह एक शिखर पुरुष (सर्वोच्च व्यक्ति) थे।

शब्दार्थ: भावार्थ:
नूतनानाम् नए (के)।
स्वीकारे स्वीकार करने (मानने) में।
काठिन्यम् कठिनाई (को)।
उपेक्षिताः उपेक्षित (अनसुने) कर दिए गए।
पण्डितम्मन्यानाम् स्वयं को भारी विद्वान् मानने वालों का।
उपहासपात्रम् हँसी के पात्र।
दृष्टिः विचारधरा।
कालातिगामिनी समय को लाँघने वाली।
समादरः सम्मान।
प्रकटितः व्यक्त किया।
वस्तुतः वास्तव में।
शिखर पुरुषः सर्वोच्च व्यक्ति।



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